पितृदोष निवारण: श्राद्ध

प्रतिवर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक महालय यानी पितृपक्ष के पार्वण श्राद्ध निर्धारित रहते हैं। प्रौष्ठपदी पूर्णिमा से ही श्राद्ध आरंभ हो जाते है। इनमे ही प्रौष्ठपदी पूर्णिमा को मिला कर कुल 16 श्राद्धध कहलाते हैं।

वैदिक परंपरा के अनुसार ब्रह्म वैवर्त पुराण में यह निर्देश है कि इस संसार में आकर जो सद्गृहस्थ पितृपक्ष के दौरान अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक उनकी दिवंगत तिथिके दिन तर्पण, पिंडदान, तिलांजलि और ब्राह्मणों को भोजन कराते है, उनको इस जीवन में सभी सांसारिक सुख और भोग प्राप्त होते है। वे उच्च शुद्ध कर्मों के कारण अपनी आत्मा के भीतर एक तेज और प्रकाश से आलोकित होते है। मृत्यु के उपरांत भी श्राद्ध करने वाले सदगृहस्थ को स्वर्गलोक, विष्णुलोक और ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।

RDSPWEB

Patrika

इस धरती पर जीवन लेने के पश्चात तीन प्रकार के ऋण होते हैं

Read more: ज्योतिष क्या है

भारतीय वैदिक वांगमय के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को इस धरती पर जीवन लेने के पश्चात तीन प्रकार के ऋण होते हैं। पहला देव ऋण, दूसरा ऋषि ऋण और तीसरा पितृ ऋण। पितृ पक्ष के श्राद्ध यानी 16 श्राद्ध साल के ऐसे सुनहरे दिन हैं, जिनमें हम उपरोक्त तीनों ऋणों से मुक्त हो सकते हैं, श्राद्ध प्रक्रिया में शामिल होकर। महाभारत के प्रसंग के अनुसार, मृत्यु के उपरांत कर्ण को चित्रगुप्त ने मोक्ष देने से इनकार कर दिया था। कर्ण ने कहा कि मैंने तो अपनी सारी सम्पदा सदैव दान-पुण्य में ही समर्पित की है, फिर मेरे उपर यह कैसा ऋण बचा हुआ है।

चित्रगुप्त ने जवाब दिया कि राजन, आपने देव ऋण और ऋषि ऋण तो चुका दिया है, लेकिन आपके उपर अभी पितृ ऋण बाकी है। जब तक आप इस ऋण से मुक्त नहीं होंगे, तब तक आपको मोक्ष मिलना कठिन होगा। इसके उपरांत धर्मराज ने कर्ण को यह व्यवस्था दी कि आप 16 दिन के लिए पुनः पृथ्वी पर जाइए और अपने ज्ञात और अज्ञात पितरों का श्राद्ध तर्पण तथा पिंड दान विधिवत करके आइए। तभी आपको मोक्ष यानी स्वर्ग लोक की प्राप्ति होगी।

जो लोग दान श्राद्ध, तर्पण आदि नहीं करते, माता-पिता और बडे बुजुर्गो का आदर सत्कार नहीं करते, पितृगण उनसे हमेशा नाराज रहते हैं। उनकी नाराजगी आगे चलकर पितृदोष का अभिशाप बन जाती है। पितृदोष में माता-पिता के साथ साधारण मनमुटाव से लेकर उनपर हाथ उठाकर आक्रमण करना या उनका मानसिक और शारीरिक रूप से पीड़ित करना जैसे प्रधान कारण होते है। इसके कारण ही वे या उनके परिवार के अगली पीढी के अन्य सदस्य अपने जीचन में रोगी, दुखी और मानसिक कष्ट से पीड़ित रहते है। वे निःसंतान भी हो सकते हैं।

RDSPWEB

navhindu.com

किसको है श्राद्ध का अधिकार

श्राद्ध करने के लिए मनुस्मृति और ब्रह्मवैवर्त जैसे शास्त्रों में यही बताया गया है कि दिवंगत पितरों के परिवार में या तो ज्येष्ठ पुत्र या कनिष्ठ पुत्र और अगर पुत्र न हो तो धेवता (नाती), भतीजा, भांजा या शिष्य ही तिलांजलि और पिंडदान देने के पात्र होते हैं। कई ऐसे पितर भी होते है जिनके पुत्र संतान नहीं होती है या फिर जो संतानहीन होते हैं। ऐसे पितरों के प्रति आदर पूर्वक अगर उनके भाई-भतीजे, भांजे या अन्य चाचा-ताऊ के परिवार के पुरूष सदस्य पितृपक्ष में श्रद्धापूर्वक व्रत रखकर पिंडदान, अन्नदान और वस्त्रदान करके ब्राह्मणों से विधिपूर्वक श्राद्ध कराते है तो पीड़ित आत्मा को मोक्ष मिलता है।

Read moreश्री शनि चालीसा

महिलाएं भी श्राद्ध कर सकती है या नहीं आजकल इस प्रश्न को भी उठाया जा रहा है। वैदिक परंपरा के अनुसार महिलाएं यज्ञ अनुष्ठान, संकल्प और व्रत आदि तो रख सकती है, श्रा़द्ध का पूरा आयोजन और खर्च कर सकती है लेकिन श्राद्ध की विधि को स्वयं नहीं कर सकती है। विधवा स्त्री अगर संतानहीन हो तो अपने पति के नाम श्राद्ध का संकल्प रखकर ब्राह्मण या पुरोहित परिवार के पुरूष सदस्य से ही पिंडदान आदि का विधान पूरा करवा सकती है। इसी प्रकार जिन पितरों के कन्याएं ही वंश परंपरा में हैं तो उन्हें पितरों के नाम व्रत रखकर उसके दामाद या धेवते, नाती आदि ब्राहमण को बुलाकर श्राद्धकर्म की निवृत्ति करा सकते है। साधु-सन्तों के शिष्यगण या शिष्य विशेष श्राद्ध कर सकते  है।

क्यों नही करते है पितृपक्ष में शुभकार्य

वैसे यह पूरा पखवाडा दिवंगत पितरों के के नाम सुरक्षित रहता है। शुभ कार्य ना करने के पीछे यह कारण हो सकता है कि हम पितरों की स्मृति से दुखी होकर, या उनके जाने के दुख में उनकी आत्मा की शान्ति के लिए कोई अन्य उत्सव और मंगलकार्य कार्य नही करें। लेकिन आज के समय के लिहाज से कुछ शुभ कार्य वर्जित नहीं है।

अगर बहुत आवश्यक हो तो शुभ कार्य किए जा सकते हैं जिनमें पूजा पाठ निहित नहीं हो। खरीदारी भी की जा सकती है। ऐसा नहीं है कि शुभ कार्य करने से उनका फल प्रभावित होगा। यह केवल हमारा अपने पितरों के प्रति सम्मान होता है कि हम 16 दिन तक घर में कोई मांगलिक आयोजन नहीं करे।

Read more:  श्री बजरंग बाण

अगर बिना इष्टदेव की पूजा रहित कोई मांगलिक आयोजन किया भी जाए तो उसका कोई बुरा प्रभाव भी नहीं होता है। जो लोग अपने घर में पितरों का पूरी श्रद्धा से पूजन करते हैं, प्रति वर्ष श्राद्ध करते हैं, तर्पण करते हैं, उनके साथ पितरों का आशीर्वाद भी बना होता है। उनका कोई काम गलत नहीं होता। उन्हीं लोगों के साथ कोई बुरी घटना या अशुभ होता है, जो श्राद्ध नही करते या उनके जीतेजी अपने जीवन में पितरों को ठीक से संतुष्ट नहीं करते। उनके प्रति श्रद्धाहीन होकर उनका श्राद्ध नहीं करते, तर्पण नहीं करते। या उनसे नफरत करते है ।

श्राद्धपक्ष में ब्राह्मणों को यथाविधि भोजन कराना चाहिए :

श्राद्ध

Patrika

श्राद्ध तिथि के पूर्व ही एक दिन का उपवास या हवीक अवश्य करें और भोग लगाने में कौवे, गाय और कुत्ते को भोजन दें।

श्राद्ध दोपहर के समय करें। बिना तर्पण, पिण्डदान किये श्राद्ध का कोई पुण्यफल नहीं मिलता।

Read more:  गणेश चतुर्थी क्यों मनाते है

श्राद्ध के दिन भोजन के लिए आए ब्राह्मणों को दक्षिण दिशा में आसन देकर बैठाएं।

पितरों की पसंद का भोजन दूध, दही, घी और शहद के साथ अन्न से बनाए गए पकवान जैसे खीर आदि है। इसमे पितरों के पसन्द की शाकाहारी भोजन ही बनाना वाहिए। उड़द की दाल के बड़े और खीर अवश्य भोजन में शामिल करें। सब्जी, चावल, दाल भी हो लेकिन मसूरदाल नहीं।

तैयार भोजन में से सबसे पहले गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटी के लिए थोड़ा सा भाग निकालें।

इसके बाद हाथ जल, अक्षत यानी चावल, चन्दन, फूल और तिल लेकर ब्राह्मणों से संकल्प लें।

कुत्ते और कौए के निमित्त निकाला भोजन कुत्ते और कौए को ही कराएं, किंतु देवता और चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं।
इसके बाद ही ब्राह्मणों को भोजन कराएं।

पूरी तृप्ति से भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों के मस्तक पर तिलक लगाकर यथाशक्ति कपड़े, अन्न और दक्षिणा दान कर आशीर्वाद पाएं। यह भी ध्यान रखा जाए कि ब्राह्मण मूर्ख, अक्षर ज्ञानहीन, कुकर्मी, कुविचारी, कुल गोत्रहीन, लालची और बदनाम व्यक्ति न हो क्योकि ऐसे ब्राह्मण का दिया गया  आशीर्वाद फलता नही। ब्राह्मण वेश मे ही पितर पधारते हैं।

ब्राह्मणों को भोजन के बाद घर के द्वार तक पूरे सम्मान के साथ विदा करके आना चाहिए। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों के साथ-साथ पितर लोग भी ब्रह्मलोक के लिए प्रस्थान करते हैं। इसके बाद अपने परिजनों, दोस्तों और रिश्तेदारों को भोजन कराना चाहिए। अन्त में खुद करते हैं।


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Posts

Update

नवरात्र व्रत, पूजन विधि

नवरात्र व्रत, पूजन विधि नवरात्र का पर्व, भारत में हिन्दू धर्म ग्रंथ एवं पुराणों के अनुसार माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरुपो की आराधना का श्रेष्ठ समय होता है। हिन्दू पंचांग की गणना के अनुसार नवरात्र  Read more…

Update

हनुमान जी दूर कर देंगे सारे दुख, शनिवार को करें पीपल का ये उपाय

हनुमान जी दूर कर देंगे सारे दुख, शनिवार को करें पीपल का ये उपाय मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी का दिन कहा गया जाता है। कहा जाता है कि इस दिन पीपल की पूजा Read more…

Update

क्यों मनाया जाता है नागपंचमी का त्योहार

 क्यों मनाया जाता है नागपंचमी का त्योहार पूरे भारत में आज नागपंचमी मनाई जा रही है। हिन्दी और संस्कृत में नाग का मतलब सांप है और नागों को समर्पित इस त्योहार के दिन उनकी पूजा Read more…

Translate »